जम्मू-कश्मीर के लिए राज्य का दर्जा मांग रहे याचिकाकर्ता को चीफ जस्टिस ने पहलगाम घटना की दिलाई याद, केंद्र से याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा
जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 8 सप्ताह के लिए टल गई है. कोर्ट ने केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने को कहा है. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने अहम टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि इस मामले पर विचार करते हुए जमीनी सच्चाइयों की अपेक्षा नहीं की जा सकती. हमें याद रखना होगा कि कुछ दिनों पहले पहलगाम में किस तरह की घटना हुई थी.
याचिकाकर्ता जहूर अहमद बट और खुर्शीद अहमद मलिक ने कहा है कि 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने केंद्र सरकार के फैसले को सही ठहराया था. फैसला देते समय कोर्ट ने केंद्र सरकार के इस आश्वासन को दर्ज किया था कि जम्मू कश्मीर को बाद में राज्य का दर्जा दे दिया जाएगा. याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण और मेनका गुरुस्वामी ने पक्ष रखा.
उनकी बातों के जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में चुनाव करवाने का आश्वासन दिया था. उसे पूरा किया जा चुका है. राज्य का दर्जा देने का फैसला एक गंभीर विषय है. इसमें बहुत सारी बातों को ध्यान में रखना होगा. यह समझ में नहीं आ रहा है कि अभी इस याचिका को क्यों दाखिल किया गया है? क्या इसका मकसद देश के उस हिस्से में स्थिति की जटिलता को बढ़ाना है?
इस पर कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह याचिकाओं पर 8 सप्ताह में लिखित जवाब दाखिल करे. कोर्ट ने भी इस बात पर सहमति जताई कि इस तरह के मामलों में फैसला लेने के लिए जमीनी सच्चाइयों की तरफ ध्यान देना जरूरी है. ध्यान रहे कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को अगस्त 2019 में संसद ने निष्प्रभावी कर दिया था. साथ ही, राज्य को 2 केंद्र शासित क्षेत्र जम्मू कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दिया था. 2023 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इस कदम को सही ठहराया था.
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