Mumbai Bomb Blast 2006: 19 साल बाद इंसाफ, बॉम्बे हाई कोर्ट ने 7/11 धमाकों में फांसी और उम्रकैद पाए 12 कैदियों को किया बरी
मुंबई लोकल ट्रेन 7/11 बम धमाकों के मामले में सोमवार (21 जुलाई, 2025) को बॉम्बे हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. 19 सालों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जबरन फंसाए गए मुस्लिम युवाओं को इंसाफ मिला. कोर्ट ने विशेष मकोका अदालत की ओर से 5 अभियुक्तों एहतिशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी, कमाल अंसारी, फैसल अता उर्रहमान शेख, आसिफ बशीर और नवेद हुसैन को दी गई फांसी की सजा को गैरकानूनी करार दिया.
इसी के साथ कोर्ट ने 7 अभियुक्तों मोहम्मद अली शेख, सुहैल शेख, उर्रहमान लतीफ उर्रहमान, डॉ. तनवीर, मुअज्जम अता उर्रहमान शेख, माजिद शफी और साजिद मरगूब अंसारी को दी गई उम्रकैद की सजा को भी रद्द कर दिया. हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस ए.एस. कुलकर्णी और जस्टिस श्याम सी. चांदक शामिल थे, ने सुबह साढ़े नौ बजे यह फैसला सुनाया.
इंसाफ की हुई जीत, बेगुनाहों की रिहाई
कोर्ट ने अभियुक्तों से जबरन लिए गए इकबाली बयान (कबूलनामे) को पूरी तरह खारिज कर दिया और उसे अवैध बताया. इसके अलावा, सरकारी गवाहों की गवाही को भी अदालत ने स्वीकार नहीं किया. जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इस फैसले को न्याय की बुलंदी और सच्चाई की जीत करार देते हुए कहा कि यह उन परिवारों के लिए बहुत बड़ा दिन है, जिनके बेटे 17 साल से झूठे आरोपों में जेल में सजा काट रहे थे.
उन्होंने कहा कि हम इस दर्दनाक दौर की कल्पना भी नहीं कर सकते, जो इन बेगुनाहों और उनके परिवारों ने 19 साल तक गुजारा. यह जमीयत उलमा महाराष्ट्र लीगल सेल की एक ऐतिहासिक जीत है, जिन्होंने लगातार कानूनी लड़ाई लड़ी और आखिरकार 12 निर्दोषों को बाइज्जत रिहाई दिलाई, जिनमें 5 को फांसी और 7 को उम्रकैद हो चुकी थी.
आतंकवादी करार देना सोची-समझी साजिश
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हमारे वकीलों ने दिन-रात मेहनत की और ऐसी ठोस दलीलें दी कि अभियोजन पक्ष का पूरा झूठ उजागर हो गया. यह फैसला एक बार फिर हमारे उस लंबे समय से उठाए जा रहे मुद्दे को साबित करता है कि मुस्लिम युवकों को आतंकवाद के झूठे आरोपों में फंसाकर उनकी जिंदगी बर्बाद करना एक सोची-समझी साजिश है.
उन्होंने कहा कि यह न केवल निर्दोषों को जेल की सलाखों के पीछे डालता है, बल्कि एक पूरी कौम को बदनाम भी करता है. जब तक पुलिस और जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी और निर्दोषों की जिंदगियां यूं ही बर्बाद होती रहेंगी. मौलाना मदनी ने यह भी कहा कि मौजूदा राजनीतिक हालात में मुसलमान पुलिस और एजेंसियों के लिए आसान निशाना है.
जान बूझकर पक्षपातपूर्ण केस की जांच
पूर्व मुख्य न्यायाधीश उड़ीसा हाईकोर्ट और जमीयत उलमा-ए-हिंद के अधिवक्ता जस्टिस मुरलीधर ने टिप्पणी की कि इस केस की जांच जानबूझकर पक्षपातपूर्ण रखा गया था. उनका कहना था कि जब जनता की भावनाएं भड़की हों तो मीडिया ट्रायल के जरिए लोगों को गुनहगार साबित कर दिया जाता है और बाद में सबूत जुटाए जाते हैं. यह टिप्पणी हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था की हकीकत को बयां करती है.
साजिश करने वालों को मिले सजा
मौलाना मदनी ने कहा कि कानून लागू करने वाले विभागों को मिली खुली छूट ने उन्हें बेलगाम बना दिया है, जिसका सबसे खराब उदाहरण यह मामला है. 19 साल की सजा के बाद रिहाई तो हो गई, लेकिन जिन लोगों ने यह साजिश की, उन्हें कोई सजा नहीं मिली और ना ही कोई पूछताछ हुई. उन्होंने कहा कि हम इस फैसले का दिल से स्वागत करते हैं, लेकिन जब तक जिम्मेदारों को सजा नहीं मिलती, यह इंसाफ अधूरा समझते हैं.
उन्होंने कहा कि मीडिया की ओर से मुसलमानों को निशाना बनाकर चलाया जाने वाला दुष्प्रचार अभियान इस देश के लोकतंत्र पर धब्बा है. अदालत ने अपने फैसले में आदेश दिया कि यदि अभियुक्त किसी और मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तुरंत जेल से रिहा किया जाए. यहां तक कि कमाल अंसारी, जिनकी जेल में मृत्यु हो गई थी, उन्हें भी बाइज्जत बरी कर दिया गया.
ऑनलाइन सुनवाई देख रहे थे आरोपी
जब जस्टिस कुलकर्णी फैसला पढ़ रहे थे, तब फांसी की सजा पाए पांच अभियुक्त ऑनलाइन सुनवाई देख रहे थे. पहले उनके चेहरों पर मायूसी थी, लेकिन जैसे ही फैसला उनके पक्ष में आया, वे खुश हो गए और कोर्ट का शुक्रिया अदा किया. सीनियर एडवोकेट योग मोहित चौधरी ने कोर्ट का धन्यवाद किया और कहा कि आज के फैसले से न्यायपालिका पर जनता का भरोसा बढ़ेगा और कानून की सर्वोच्चता बनी रहेगी.
उन्होंने रक्षात्मक अधिवक्ताओं को बहस का पूरा मौका देने के लिए भी धन्यवाद दिया. चौधरी ने भावुक होकर कहा कि अगर इस मुकदमे को बारीकी से देखा जाए तो साफ पता चलता है कि आरोपियों के खिलाफ झूठे सबूत गढ़े गए थे, जिसकी आज अदालत ने पुष्टि कर दी.
देश के नामी क्रिमिनल अधिवक्ता शामिल
जमीयत उलमा महाराष्ट्र लीगल सेल ने इस मुकदमे में देश के नामी क्रिमिनल अधिवक्ताओं की सेवाएं ली थीं, जिनमें सीनियर एडवोकेट एस. नागामुथु (पूर्व न्यायाधीश मद्रास हाईकोर्ट), सीनियर एडवोकेट मुरलीधर (पूर्व मुख्य न्यायाधीश उड़ीसा हाईकोर्ट), सीनियर एडवोकेट नित्या रामाकृष्णन (सुप्रीम कोर्ट), एडवोकेट योग मोहित चौधरी और कई अन्य वकील शामिल थे.
इनकी मदद के लिए एडवोकेट अब्दुल वहाब खान, एडवोकेट शरीफ, एडवोकेट अंसार तंबोली, एडवोकेट गौरव भवानी, एडवोकेट आदित्य मेहता, एडवोकेट शाहिद नदीम, एडवोकेट अफजल नवाज, एडवोकेट बिलाल आदि को जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं. विशेष मकोका अदालत के जज वाई.डी. शिंदे ने पहले एहतिशाम सिद्दीकी, कमाल अंसारी, फैसल अता उर्रहमान, आसिफ बशीर और नवेद हुसैन को फांसी और 7 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जबकि एक अभियुक्त अब्दुल वहाब को बाइज्जत बरी किया था.
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